धार्मिक पीड़ा और सामाजिक विडंबना:शांतिवन की सिसकती आत्मा—क्या यही है हमारी श्रद्धांजलि ?
धार्मिक पीड़ा और सामाजिक विडंबना: शांतिवन की सिसकती आत्मा — क्या यही है हमारी श्रद्धांजलि? स्थान: नामली (जिला रतलाम, मध्यप्रदेश) स्थल: शांतिवन – मोक्षधाम "जहां आत्मा को शांति मिलनी चाहिए, वहां बिखरा है कचरा – क्या यही है हमारी सच्ची श्रद्धांजलि?" मृत्यु एक अटल सत्य है — जीवन की अंतिम परिणति। परंतु हिंदू धर्म इसे अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नयी यात्रा का प्रारंभ मानता है। गरुड़ पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णन है कि आत्मा मृत्यु के बाद 13 दिन तक पृथ्वी पर रहती है और परिजनों द्वारा की जाने वाली अंतिम क्रियाओं को देखती है। ऐसे में प्रश्न उठता है — क्या आत्मा को गंदगी, उपेक्षा और अव्यवस्था के बीच शांति मिल सकती है? --- शांतिवन: जहां पवित्रता दम तोड़ रही है नामली का मोक्षधाम "शांतिवन" आज अपने नाम के विपरीत, गंदगी, कचरे और प्रशासनिक लापरवाही का केंद्र बन चुका है। दाह संस्कार के बाद फूल, कफन, नारियल, चारा, घी के डिब्बे आदि सामग्री खुले में बिखरी पड़ी रहती है। यह सामग्री तीसरे दिन की अस्थि क्रिया के बाद पास के कच्चे नाले में या फिर पास किसी नदी में प...