किसानों की बेहाली पर गंभीर मंथन के बजाय तमाशेबाज़ी पर उतरे नेताजी; बेजुबान जानवरों को राजनीति का मोहरा बनाना निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना।
'बिल्ली' हाथ में, गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने का यह कैसा सियासी ड्रामा? किसानों की बेहाली पर गंभीर मंथन के बजाय तमाशेबाज़ी पर उतरे नेताजी; बेजुबान जानवरों को राजनीति का मोहरा बनाना निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना। दिलीप कर्णधार (यर्थाथ) रतलाम मध्यप्रदेश लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका जनता की आवाज को प्रखरता से उठाना और प्रशासन को उसकी कमियां आईना दिखाकर सचेत करना होता है। लेकिन जब यह भूमिका केवल 'सुर्खियां बटोरने' और 'सस्ता प्रचार' पाने के हथकंडों तक सिमट जाए, तो आंदोलन का मूल उद्देश्य ही दम तोड़ देता है। पिछले दिनों कलेक्टोरेट में किसान कांग्रेस के एक नेता द्वारा हाथ में 'बिल्ली' लेकर पहुंचना और प्रशासन की तुलना उससे करना, इसी गिरते राजनीतिक स्तर का एक ज्वलंत और दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है। नेताजी ने हाथ में बिल्ली उठाकर अपनी पीठ तो थपथपा ली होगी कि उन्होंने बहुत बड़ा 'कटाक्ष' कर दिया, लेकिन हकीकत यह है कि इस कृत्य से उन्होंने किसानों की गंभीर समस्याओं का मज़ाक उड़ाकर रख दिया। > बेजुबानों का सियासी इस्तेमाल: संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ...