सरकारी ज़मीन पर सालों से अवैध कब्ज़ा, लाखों की कमाई और प्रशासन मौन – नामली मुक्तिधाम की ज़मीन अब भी अधर में
सरकारी ज़मीन पर सालों से अवैध कब्ज़ा, लाखों की कमाई और प्रशासन मौन – नामली मुक्तिधाम की ज़मीन अब भी अधर में
रतलाम/नामली, मध्यप्रदेश।
जब देशभर में वक्फ बोर्ड की ज़मीनों को लेकर बहस सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुकी है और मुस्लिम समुदाय के बीच भ्रम फैलाया जा रहा है, तब मध्यप्रदेश की ज़मीनी हकीकत कहीं अधिक चौंकाने वाली और चिंताजनक है। रतलाम जिले की नगर परिषद नामली क्षेत्र में शासकीय ज़मीनों पर वर्षों से दबंगों का अवैध कब्ज़ा है। ये लोग इन जमीनों पर खुलेआम खेती कर रहे हैं और लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। अफ़सोस की बात यह है कि प्रशासनिक तंत्र इन ज़मीनों को मुक्त कराने के नाम पर सिर्फ कागज़ी कार्रवाई कर खानापूर्ति करता नज़र आता है।
65 बीघा शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा – प्रशासन की अनदेखी
नामली के पास श्री गोपाल गौशाला के आसपास लगभग 65 बीघा शासकीय भूमि दबंगों के कब्ज़े में है। राजस्व विभाग द्वारा इस भूमि की नपती भी कर ली गई है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह ज़मीन शासकीय है। फिर भी न तो इसे गौशाला को विधिवत रूप से आवंटित किया गया, न ही कब्जाधारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही की गई। वर्ष दर वर्ष यही लोग इस भूमि पर खेती कर रहे हैं, जिससे उन्हें लाखों का लाभ मिल रहा है और शासकीय संपत्ति का दुरुपयोग होता जा रहा है।
शांतिवन मुक्तिधाम संकट में – बच्चों की मृत्यु होने पर दफनाने तक की जगह नहीं बची
नामली का 'शांतिवन मुक्तिधाम' न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है, बल्कि यहाँ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी अनुकरणीय कार्य हुआ है। दर्जनों फलों के पेड़ इस क्षेत्र की हरियाली को संजोए हुए हैं। लेकिन रेलवे दोहरीकरण कार्य के कारण पहले ही लगभग एक बीघा भूमि अधिग्रहित की जा चुकी है। अब हाल ही में रेलवे ठेकेदारों ने लगभग आधा बीघा ज़मीन पर चूना डालकर आगे की तैयारी शुरू कर दी है, जिससे न केवल हरे-भरे पेड़ों को नुकसान होगा, बल्कि पहले से ही सीमित हो चुकी श्मशान भूमि पर भी संकट और गहरा जाएगा।
समिति की मांग वर्षों से अनसुनी – 8 बीघा ज़मीन अभी भी अधर में
श्री निःस्वार्थ शांतिवन सेवा समिति द्वारा बीते कई वर्षों से श्मशान भूमि के विस्तार हेतु शांतिवन के समीप स्थित 12 बीघा शासकीय ज़मीन में से 8 बीघा ज़मीन आवंटित करने की मांग की जा रही है। परंतु राजस्व विभाग और नगर परिषद नामली इस पर अब तक कोई निर्णय नहीं ले पाई है। विडंबना यह है कि यह भूमि आज भी दबंगों के कब्जे में है, जहां वे निर्विघ्न खेती कर लाभ कमा रहे हैं, जबकि अंतिम संस्कार के लिए भूमि की कमी गंभीर स्थिति उत्पन्न कर रही है।
क्या वास्तव में सरकार पारदर्शिता चाहती है?
आज जब केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड की ज़मीनों को लेकर पारदर्शिता की बात करती है, तब यह ज़रूरी हो जाता है कि सबसे पहले अपने ही राज्य की शासकीय ज़मीनों को अवैध कब्जों से मुक्त कराया जाए। लाखों बीघा सरकारी ज़मीनें वर्षों से निजी कब्जों में हैं, जहां से हर साल करोड़ों की अवैध कमाई हो रही है और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।
वक्फ बोर्ड कानून मुस्लिम समुदाय के मध्यमवर्गीय और ग़रीब परिवारों के लिए कल्याणकारी साबित हो सकता है, लेकिन जब तक सरकार खुद की ज़मीनों पर पारदर्शिता नहीं दिखाती, तब तक किसी भी समुदाय को डराने की कोई नैतिकता नहीं बचती। शासन को चाहिए कि वह नामली जैसी जगहों पर वर्षों से लंबित ज़मीन आवंटन की मांगों को जल्द पूरा करे, ताकि धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जा सके।
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