"शांतिवन मुक्तिधाम बना जल-स्थल: बे मौसम बारिश की बौछार ने खोल दी नामली नगर परिषद की लापरवाही की परतें!"---
"शांतिवन मुक्तिधाम बना जल-स्थल: बे मौसम बारिश की बौछार ने खोल दी नामली नगर परिषद की लापरवाही की परतें!"
---
नामली (जिला रतलाम)। मध्यप्रदेश
नगर विकास की झूठी चमक और कागजी दावों की हकीकत को सोमवार शाम बे मौसम की बारिश ने पूरी तरह नंगा कर दिया। नामली नगर परिषद के अधीन संचालित शांतिवन मुक्तिधाम का शोक सभा गृह में गर्मी में बारिश हुई बारिश से फर्श पर आएं पानी से तालाब में तब्दील हो गया। न कहीं कोई रोकथाम की व्यवस्था,न पानी से बचने की कोई ढांचागत सुविधा—और यह हाल तब है जब इस बार वहां कोई अंतिम संस्कार नहीं था। लेकिन यदि होता, तो क्या होता? यही सोच नगरवासियों को झकझोर रही है।
शोक सभा गृह की स्थिति यह है कि यह तीनों दिशाओं से खुला हुआ है। बारिश की हल्की बौछार भी सीधी अंदर घुस जाती है। नतीजा—फर्श पर पानी ही पानी। न बैठने की जगह,न खड़े रहने की सुविधा। पिछली दीवार पर निर्माण के दौरान जानबूझकर छोड़े गए चार खुले खांचे अब मौत की गरिमा पर सवाल बन चुके हैं,क्योंकि वहीं से पानी बड़ी मात्रा में भीतर प्रवेश करता है।
यह पहली बार नहीं हुआ है।
दो साल पहले की दर्दनाक घटना आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है, जब एक बुजुर्ग का अंतिम संस्कार बारिश के दौरान किया गया था। उस दिन शोकसभा में आए सभी परिजन और गणमान्य नागरिक पूरे समय खड़े भीगते रहे। छत से पानी टपकता रहा, शवदाह स्थल पर रखी चद्दरों से बूंदें चूती रहीं। तब एक स्थानीय जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि से तीखी बहस के बाद,बड़ी मुश्किल से सिर्फ दो चद्दरें बदली गईं। बाकी टूटी-फूटी चद्दरें आज भी वैसे ही जर्जर पड़ी हैं—मानो किसी अगली शर्मनाक घटना का इंतजार कर रही हों।
समस्या पुरानी है,सुझाव भी दिए गए थे—कि शोक सभा गृह के चारों ओर एक-एक फीट के लोहे के शेड लगाए जाएं, जिससे बारिश का पानी अंदर न आए;छत पर बनी पानी की टंकी की मरम्मत हो;और पीछे की दीवार के खुले खांचे बंद किए जाएं। लेकिन नगर परिषद ने तब भी कान नहीं दिए, और आज भी वही ढाक के तीन पात।
नगर परिषद की यह बेरुखी अब लोगों में गुस्से का कारण बन चुकी है।
सवाल यह नहीं कि इस बार कोई अंतिम संस्कार नहीं हुआ। सवाल यह है कि जब अगली बार होगा,तो क्या फिर वही शर्मनाक दृश्य दोहराया जाएगा? क्या शवयात्रा में शामिल लोग फिर भीगते रहेंगे,और नगर परिषद फिर बहरेपन का अभिनय करेगी?
नगरवासियों की आवाज़ एक ही मांग कर रही है:
"हम अपने जीवित नागरिकों के लिए तो संघर्ष कर ही रहे हैं,कम से कम मृतकों की अंतिम यात्रा तो सम्मानपूर्वक होने दो!"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें