60 वर्षों से अन्नत्याग, हनुमान भक्ति और यज्ञ सेवा में लीन महात्यागी श्री मंगलदास जी महाराज का देवलोकगमन – अयोध्या से मालवा तक छाया शोक,जयकारों से गूंजा आसमान, शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब।

मालवा ने खोया अपना महातपस्वी संत ।

60 वर्षों से अन्नत्याग, हनुमान भक्ति और यज्ञ सेवा में लीन महात्यागी श्री मंगलदास जी महाराज का देवलोकगमन – अयोध्या से मालवा तक छाया शोक, जयकारों से गूंजा आसमान, शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब

नामली (रतलाम/मालवा) –
आज मालवा की पावन भूमि शोकाकुल है। छह दशक से अधिक समय तक अन्न का पूर्ण त्याग कर, तप, जप, हनुमान भक्ति और यज्ञ सेवा में संपूर्ण जीवन अर्पित करने वाले महात्यागी, महासंत, परम् पूज्य श्री मंगलदास जी महाराज ने ब्रह्ममुहूर्त में अपनी अंतिम यज्ञ आहुति देकर प्रभु श्रीराम के चरणों में लीन हो गए। उनके देवलोकगमन की खबर ने न केवल नामली, उज्जैन, खाचरोद, बाजेडा और विरिया खेड़ी को शोकमग्न किया, बल्कि अयोध्या सहित देशभर के भक्तों के हृदयों को भी विचलित कर दिया।
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अद्वितीय तपस्या – 60 वर्षों का अन्नत्याग

महाराज का तप किसी पुराणकालीन ऋषि-मुनियों से कम नहीं था। लगभग 60 वर्ष पूर्व उन्होंने अन्न का त्याग किया और जीवनभर केवल फलाहार, जल एवं प्रभु स्मरण के सहारे देह को साधना की अग्नि में तपाया।
वे श्रीमद्भागवत महापुराण के इस वचन के साकार स्वरूप थे –
"जो जीव अपनी इन्द्रियों को वश में कर निरंतर भगवान का स्मरण करते हैं, वही सच्चे योगी और तपस्वी हैं।"
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अनेक आश्रम – एक ही ध्येय: सेवा और धर्म प्रचार

अयोध्या, बाजेडा, नामली और विरिया खेड़ी खाचरोद स्थित उनके आश्रम सदैव धर्म प्रचार, यज्ञ परंपरा और गरीबों की सेवा के केंद्र बने।
1997 में उन्होंने विरिया खेड़ी के मुख्य आश्रम से फोरलेन स्थित बाबा जी के कुएं वाले मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
1998 में नगर में प्रथम बार 21 कुण्डीय यज्ञ का आयोजन कराया, जिसने आगे 11, 21, 51 और 101 कुण्डीय भव्य यज्ञों की परंपरा को जन्म दिया और नगर के धार्मिक इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ा।
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अंतिम सांस तक यज्ञ सेवा

महाराज का जीवन गीता के “कर्मण्येवाधिकारस्ते” श्लोक का साक्षात उदाहरण था।
अपने अंतिम दिन भी उन्होंने ब्रह्ममुहूर्त में यज्ञ की आहुति दी और फिर प्रभु में लीन हो गए। भक्तों के अनुसार, यह क्षण उनके जीवन का सबसे पावन दृश्य था – जब एक संत, यज्ञ की अग्नि में अंतिम आहुति देकर प्रभु श्रीराम की शरण में चले गए।
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भव्य शोभायात्रा – जनसैलाब और जयकारों की गूंज

रूप नगर आश्रम से पार्थिव शरीर को विरिया खेड़ी मुख्य आश्रम लाया गया, जहां से शोभायात्रा रिगनिया, वटलावदी, बरबोदना, सेमलिया, बाजेडा होते हुए नामली नगर पहुंची।
हजारों भक्तों की भीड़,‘जय श्रीराम’,‘जय गुरुदेव’ और ‘हनुमानजी महाराज की जय’ के उद्घोषों से आसमान गूंज उठा। शोभायात्रा में हर आंख नम थी, पर होंठों पर गुरुदेव के जयकारे थे।
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महाराज की दिनचर्या – अनुशासन और आस्था का प्रतीक

भक्तों का कहना था कि महाराज प्रतिदिन किसी भी मौसम में स्नान कर यज्ञ आहुति अवश्य देते थे।
रूप नगर आश्रम में 24 घंटे भंडारा चलता रहा, जहां आने वाले हर व्यक्ति को प्रसाद और आशीर्वाद मिलता।
अनेक भक्तों ने उनके चमत्कारों का अनुभव किया – बीमारियों से मुक्ति, संकटों का टलना और मनोवांछित फल की प्राप्ति।
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धार्मिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति

नामली में 28 वर्षों और मालवा अंचल में 60 वर्षों तक उन्होंने आशीर्वाद, स्नेह और भक्ति की ज्योति जलाए रखी। हनुमान भक्ति, यज्ञ सेवा, अन्नत्याग और तप की संपूर्ण साधना से सजे उनके जीवन ने आने वाली पीढ़ियों के लिए अमिट प्रेरणा छोड़ी।
उनका जाना मालवा के धार्मिक व सामाजिक जीवन में ऐसी रिक्तता छोड़ गया है, जिसे समय भी नहीं भर पाएगा।
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नगर रहा बंद,श्रद्धांजलि में डूबा क्षेत्र
महाराज के सम्मान में नामली नगर के सभी प्रतिष्ठान बंद रहे। गांव-गांव से भक्त अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे। हर कोई यही कह रहा था – “ऐसे महापुरुष जन्म-जन्म में मिलते हैं।”

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