"खेल नहीं,अफसरशाही का खेल! मैदान बना फाइलों का कैदी!"
8 साल से जमा 30 लाख के बाद भी युवा खेल मैदान से वंचित –अब होगा आमरण अनशन!
नामली (रतलाम, म.प्र)
युवाओं के सपनों को आकार देने वाला खेल मैदान, पिछले 8 वर्षों से केवल फाइलों और वादों में ही सिमट कर रह गया है। 2018 में सांसद निधि से स्वीकृत इस खेल मैदान के लिए 30 लाख रुपए नगर परिषद के खाते में जमा हैं, लेकिन मैदान आज तक जमीन पर नहीं उतर पाया। नतीजा – युवाओं का गुस्सा अब आंदोलन का रूप लेने को तैयार है।
🏃♂️ सड़कों पर दौड़ते खिलाड़ी, मैदान के लिए तरसते युवा
नामली और पंचेड़ जैसे क्षेत्र के युवा,जिनमें कई सेना भर्ती की तैयारी कर रहे हैं, अभाव में सड़कों पर दौड़ने को मजबूर हैं। खिलाड़ी अभ्यास नहीं कर पा रहे, बच्चों को खेलने की जगह नहीं, और एक पूरे क्षेत्र का भविष्य कुछ अफसरों की अनदेखी में उलझा पड़ा है।
📑 क्या है अब तक की कहानी?
2018: सांसद निधि से खेल मैदान के लिए 30 लाख की स्वीकृति।
2018-2022: जमीन चयन और मार्ग विवादों में समय बर्बाद।
2024: कलेक्टर द्वारा 22 अक्टूबर को नवीन भूमि (पलदुना रोड सर्वे क्रं. 54) का आवंटन।
अब तक: 7 माह बीतने के बावजूद राजस्व विभाग द्वारा सीमांकन नहीं।
परिणाम: निर्माण कार्य अब भी शुरू नहीं हो सका।
नगर परिषद की ओर से बताया गया कि जैसे ही सीमांकन होकर भूमि हस्तांतरित होती है, एक महीने में नया टेंडर निकाल कर निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है।
⚠️ अब चेतावनी का दौर!
खेल मैदान संघर्ष समिति के प्रमुख शैलेंद्र डिंडोर, छत्रपाल सिंह सोनगरा, विकास बौरासी, अभिजीत अग्रवाल, लोकेश हेमावत सहित कई स्थानीय युवा नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र सीमांकन कर कार्य प्रारंभ नहीं किया गया तो वे आमरण अनशन पर बैठेंगे। अब तक हुए घेराव के बावजूद शासन-प्रशासन की चुप्पी ने युवाओं को यह कदम उठाने पर मजबूर किया है।
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एक सवाल पूरे सिस्टम से – कब मिलेगा युवाओं को उनका हक?
जिस देश में ओलंपिक की तैयारी के लिए खिलाड़ी दिन-रात मेहनत करते हैं, वहां एक छोटे से नगर में 8 सालों में एक खेल मैदान न बन पाना अफसरशाही की सबसे बड़ी विफलता है।
क्या अब युवाओं की आवाज़ आमरण अनशन के बाद ही सुनी जाएगी?
अब समय आ गया है कि केवल वादे नहीं, ज़मीन पर काम हो।
खेल केवल मनोरंजन नहीं, यह क्षेत्र के भविष्य की बुनियाद है – और उसे यूं नजरअंदाज करना हर युवा के साथ अन्याय है।
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