नामली थाने में 'वर्दी' हुई दागदार: टीआई अमित कोरी पर फरियादी के साथी को पीटने का आरोप, सीसीटीवी में कैद हुई करतूत।


खाकी के रक्षक ही बने भक्षक? रिपोर्ट लिखाने आए युवक के साथ कंप्यूटर कक्ष में की गई बर्बरता; पूर्व थाना प्रभारी गायत्री सोनी की कार्यशैली को याद कर रही जनता।
नामली (रतलाम मध्यप्रदेश) 
कहते हैं कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? रतलाम जिले के नामली थाने में इन दिनों कुछ ऐसा ही आलम है। साइबर सेल से आकर थाने की कमान संभालने वाले कार्यवाहक थाना प्रभारी अमित कुमार कोरी अपनी कार्यशैली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में हैं। ताजा मामला थाने के भीतर एक फरियादी के साथ आए युवक से मारपीट का है, जिसने पुलिस प्रशासन की साख पर बट्टा लगा दिया है।
थाने के भीतर गुंडागर्दी: सीसीटीवी खोलेगा पोल
घटनाक्रम के अनुसार, बीते 6 मई 2026 की रात करीब 10 बजे पल्दूना टावर के पास रीतिक मालवीय और एक चर्मकार समाज के युवक पर कुछ दबंगों (जितेन्द्र चौधरी, पवन चौधरी, विकास चौधरी व अन्य) ने लठ से जानलेवा हमला किया। पीड़ित जब लहुलूहान हालत में अपने साथियों के साथ नामली थाने रिपोर्ट दर्ज कराने पहुँचा, तो वहाँ न्याय मिलने के बजाय उन्हें खाकी का रौद्र रूप देखना पड़ा। आरोप है कि रिपोर्ट लिखाने आए साथी सुभाष पिता रणछोड़ धाकड़ के साथ कंप्यूटर कक्ष में थाना प्रभारी अमित कोरी ने अकारण धक्का-मुक्की और मारपीट की। यह पूरी घटना रात्रि लगभग 11 बजे की है, जो थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद बताई जा रही है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि एसपी महोदय उस समय के फुटेज की बारीकी से जांच करें, तो टीआई की बर्बरता साफ उजागर हो जाएगी।
विवादों से पुराना नाता: कानून व्यवस्था संभालने में नाकाम।
अमित कोरी का कार्यकाल शुरू से ही विवादित रहा है। गायत्री सोनी के हटने के बाद जब उन्हें प्रभार मिला, तब उम्मीद थी कि व्यवस्था सुधरेगी, लेकिन हकीकत इसके उलट रही:पक्षपातपूर्ण कार्रवाई: भीम आर्मी के दबाव में आकर पात्र प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों के खिलाफ क्रॉस रिपोर्ट दर्ज करना।
भ्रामक बयानबाजी:  भीम आर्मी के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहन परिहार यूट्यूब चैनल पर वीडियो बयान जारी कर वरिष्ठ समाजसेवियों और कलेक्टर तक को लपेटे में लेने पर कार्रवाई नहीं करना।
प्रबंधन में विफलता: फोरलेन पर मुकेश कुमावत की मौत के बाद जब जनता आक्रोशित थी, तब कोरी स्थिति संभालने में पूरी तरह विफल रहे। अंततः पूर्व टीआई गायत्री सोनी और एसडीओपी किशोर पाटनवाला को मोर्चा संभालना पड़ा तब जाकर दाह संस्कार हो सका।
पत्रकारों पर उत्पीड़न: बिना किसी ठोस सबूत या घटनास्थल पर उपस्थिति नहीं होने पर एक स्थानीय पत्रकार पर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करना।
गंभीर धाराओं को दबाने का खेल
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि चर्मकार समाज से होने के कारण उनके साथ न केवल रास्ते में जातिसूचक गालियां देकर मारपीट की गई, बल्कि थाने में भी उनकी सुनवाई ठीक से नहीं हुई। थाना प्रभारी ने मामले की गंभीरता और चोटों को नजरअंदाज करते हुए आरोपियों के खिलाफ मामूली धाराओं में प्रकरण दर्ज कर उन्हें बचाने का प्रयास किया है। सियासी दबाव और समझौता की कोशिशें सूत्रों की मानें तो टीआई को बचाने के लिए कुछ जिला स्तरीय कांग्रेसी नेता भी सक्रिय हो गए हैं। चर्चा है कि एक कांग्रेस के रसूखदार नेता के प्रभाव के चलते इस बर्बरतापूर्ण मामले को दबाने और समझौते का दबाव बनाया जा रहा है।
जनता की मांग: हटाए जाएं लापरवाह अधिकारी
क्षेत्र की जनता अब खुलेआम कह रही है कि "इससे तो पूर्व थाना प्रभारी गायत्री सोनी ही बेहतर थीं।" पुलिस विभाग का ध्येय 'देशभक्ति-जनसेवा' है, लेकिन नामली में यह 'तानाशाही और लापरवाही' में बदलता दिख रहा है। अब देखना यह है कि क्या एसपी अमित कुमार इस गंभीर मामले का संज्ञान लेकर सीसीटीवी फुटेज की जांच कराएंगे और दोषी थाना प्रभारी पर दंडात्मक कार्रवाई करेंगे?
बड़ा सवाल: अगर गुंडों से पिटकर थाने आने वाले फरियादियों को पुलिस से ही मार खानी पड़ेगी, तो आम आदमी न्याय की गुहार लगाने कहाँ जाएगा?

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