किसानों की बेहाली पर गंभीर मंथन के बजाय तमाशेबाज़ी पर उतरे नेताजी; बेजुबान जानवरों को राजनीति का मोहरा बनाना निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना।



'बिल्ली' हाथ में, गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने का यह कैसा सियासी ड्रामा?
किसानों की बेहाली पर गंभीर मंथन के बजाय तमाशेबाज़ी पर उतरे नेताजी; बेजुबान जानवरों को राजनीति का मोहरा बनाना निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना।

 दिलीप कर्णधार (यर्थाथ)

रतलाम मध्यप्रदेश 

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका जनता की आवाज को प्रखरता से उठाना और प्रशासन को उसकी कमियां आईना दिखाकर सचेत करना होता है। लेकिन जब यह भूमिका केवल 'सुर्खियां बटोरने' और 'सस्ता प्रचार' पाने के हथकंडों तक सिमट जाए, तो आंदोलन का मूल उद्देश्य ही दम तोड़ देता है। पिछले दिनों कलेक्टोरेट में किसान कांग्रेस के एक नेता द्वारा हाथ में 'बिल्ली' लेकर पहुंचना और प्रशासन की तुलना उससे करना, इसी गिरते राजनीतिक स्तर का एक ज्वलंत और दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है।
नेताजी ने हाथ में बिल्ली उठाकर अपनी पीठ तो थपथपा ली होगी कि उन्होंने बहुत बड़ा 'कटाक्ष' कर दिया, लेकिन हकीकत यह है कि इस कृत्य से उन्होंने किसानों की गंभीर समस्याओं का मज़ाक उड़ाकर रख दिया।
> बेजुबानों का सियासी इस्तेमाल: संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
> बड़ा सवाल यह है कि मानवीय हकों की लड़ाई में इन मूक जानवरों का कसूर क्या है? राजनीति में अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए घोड़ों, कुत्तों या बिल्लियों जैसे जानवरों को कलेक्टोरेट जैसे संवेदनशील सरकारी दफ्तरों में घसीट लाना कहां की समझदारी है? माननीय उच्च न्यायालय ने भी जानवरों के अधिकारों और उनके साथ होने वाली क्रूरता को लेकर बेहद सख्त दिशा-निर्देश दिए हैं। भीषण गर्मी के इस मौसम में एक बिल्ली को भीड़ और कैमरों के बीच लाकर तमाशा बनाना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कानूनी रूप से भी अपराध की श्रेणी में आता है। नेताजी को यह समझना चाहिए कि राजनीति की लड़ाई इंसानी मंचों पर लड़ी जाती है, बेजुबानों के कंधों पर बंदूक रखकर नहीं।
मुद्दे पीछे छूटे, 'बिल्ली' पर अटकी राजनीति
आज नामली क्षेत्र के दर्जनों गांवों—सेमलिया, पल्दुना, नौगांव कला, गुणावद, बाजेड़ा, पंचेड़, भारोड़ा—के प्रधानमंत्री आवास योजना हितग्राही आवास योजना की किस्तों को लेकर परेशान हैं वहीं नामली का समर्थन मूल्य में खरीदारी बंद करने पर गरीब किसान बदहाल हैं। गेहूं उपार्जन केंद्रों पर गड़बड़ियां चरम पर हैं, महंगाई ने कमर तोड़ रखी है, और प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्तें पाने के लिए गरीब हितग्राही सरपंच-सचिवों के आगे गिड़गिड़ा रहे हैं, रिश्वत देने को मजबूर हैं।
ऐसे गंभीर और संवेदनशील माहौल में जनता को एक ऐसे परिपक्व नेतृत्व की जरूरत थी जो आंकड़ों के साथ, तर्कों के साथ और प्रशासनिक नियमों के दायरे में रहकर अधिकारियों की आंख में आंख डालकर बात करे। मगर इसके विपरीत, नेताजी कलेक्टोरेट में 'बिल्ली' का प्रदर्शन करने में व्यस्त रहे। नतीजा क्या हुआ? मूल मुद्दे—यानी भ्रष्टाचार, आवास की किस्तें और किसानों का हक—पीछे छूट गए और पूरी बहस इस बात पर आकर टिक गई कि प्रदर्शन में बिल्ली लाना सही था या गलत। क्या नेताजी का यह कदम अनजाने में प्रशासन को बचाने का प्रयास था, जिससे मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाए?
सच पर सवाल उठाने से बौखलाहट क्यों?
इस तमाशे की कलई तब और खुल गई जब मीडिया (डी भारत न्यूज़ पोर्टल संपादक)ने इस कृत्य की विसंगतियों पर सवाल उठाए और सोशल मीडिया के जरिए इसके सार्वजनिक मायने पूछे। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जब राजनीति के इस गिरते स्तर पर कटाक्ष करता है, तो नेताजी और उनके अंधसमर्थकों को आत्ममंथन करना चाहिए था। इसके विपरीत, उन्होंने सोशल मीडिया पर अभद्र, अनाप-शनाप और अमर्यादित टिप्पणियां लिखनी और लिखवानी शुरू कर दीं। यह बौखलाहट साफ दर्शाती है कि नेताजी के पास न तो अपनी इस हरकत का कोई तार्किक जवाब है और न ही उनमें सच का सामना करने का माद्दा है।
 जनता तमाशा नहीं, समाधान चाहती है।
मध्य प्रदेश का किसान और ग्रामीण अंचल की भोली-भाली जनता आज संकट में है। वे सरकारों और प्रशासन की लापरवाही से त्रस्त हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे विपक्ष के इस 'सस्ते ड्रामे' को पसंद कर रहे हैं। नेताजी को यह समझना होगा कि जमीन पर लेटकर लोट लगाने वाले कार्यकर्ता की तपस्या अपनी जगह सम्मानजनक हो सकती है, लेकिन हाथ में बिल्ली लेकर प्रशासन को चिढ़ाना केवल एक बचकानी और गैर-जिम्मेदाराना हरकत है। राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए बेजुबानों का शिकार बंद होना चाहिए। जनता को 'बिल्ली के खिताब' से कोई लेना-देना नहीं है; उसे उपार्जन केंद्रों पर अपनी फसल का सही दाम चाहिए और अपने आशियाने के लिए भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहिए। अगर नेताजी वाकई किसानों के हितैषी हैं, तो उन्हें जानवरों का सहारा छोड़ धरातल के सच और ठोस नीति के साथ प्रशासन को घेरना होगा, वरना जनता इस तरह के ड्रामों को खारिज करने में देर नहीं लगाती।

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