मेवाड़ में धर्म की बयार: कानोड़ के केरपुरा में 'शतचण्डी महायज्ञ' का शंखनाद, गूंजें रहें हैं वैदिक मंत्र, धूणी माता मंदिर जीणोद्धार प्रगति पर यज्ञ समापन पर हजारों श्रद्धालुओं का भराएगा मेला।

मेवाड़ में धर्म की बयार: कानोड़ के केरपुरा में 'शतचण्डी महायज्ञ' का शंखनाद, गूंजेंगे वैदिक मंत्र

कानोड़ (उदयपुर)। 

मेवाड़ की पावन धरा पर एक बार फिर भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। कानोड़ क्षेत्र की ग्राम पंचायत सारंगपुरा स्थित धुणी माता केरपुरा के पवित्र प्रांगण में महन्त श्री शिवानन्द गिरी जी महाराज (सेराई मठ, धोलागर मेवाड़) के पावन सान्निध्य में भव्य 'एकादश कुण्डीय शतचण्डी महायज्ञ' का आयोजन किया जा रहा है। 21 मई से शुरू हुआ यह धार्मिक अनुष्ठान क्षेत्र की खुशहाली और लोक कल्याण की कामना के साथ आयोजित हो रहा है। 
कलश यात्रा के साथ हुआ भव्य शुभारंभ
यज्ञ की शुरुआत गुरुवार, 21 मई को अलसुबह कलश यात्रा के साथ हुई। केरपुरा गांव से धुणी माता मंदिर तक निकली इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत में गणपति पूजन, मातृका पूजन और मण्डप प्रवेश जैसी शास्त्रोक्त विधियां विद्वान पंडितों के निर्देशन में संपन्न की गईं।
पांच दिवसीय अनुष्ठान का पूरा कार्यक्रम
यह महायज्ञ विक्रम संवत् 2083 के ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होकर दशमी तिथि तक चलेगा। कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार है:
21 मई: कलश यात्रा एवं यज्ञ का विधिवत प्रारंभ।
22 से 24 मई: निरंतर आहुतियां, मन्त्रोच्चारण और पूजन प्रक्रिया।
25 मई (सोमवार): महायज्ञ की पूर्णाहुति (दोपहर 12:00 से 1:30 बजे तक)।
महाप्रसादी: अनुष्ठान के दौरान प्रतिदिन दोपहर 4:00 बजे से भक्तों के लिए महाप्रसादी (भोजन) की व्यवस्था की गई है।
भक्तों का उमड़ा सैलाब
धुणी माता मंदिर के पुजारी वजेराम जी पोते बेटे के बेटे ने बताया कि इस अनुष्ठान को लेकर ग्रामीणों और सर्व हिंदू समाज में भारी उत्साह है। महन्त श्री शिवानन्द गिरी जी महाराज के दर्शन और यज्ञ का पुण्य लाभ लेने के लिए न केवल उदयपुर बल्कि आसपास के जिलों से भी श्रद्धालुओं का आना जारी है। आयोजकों (सर्व हिन्दू समाज) ने सभी धर्मप्रेमियों से अपील की है कि अधिक से अधिक संख्या में पधारकर इस महायज्ञ को सफल बनाएं और माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त करें।
घने जंगल में स्थित है 51 गांवों की आस्था का केंद्र, इतिहास में पहली बार हो रहा यज्ञ यह धार्मिक विशाल स्थल घने जंगल में स्थित है। श्रद्धालुओं द्वारा बताया जाता है कि इसे '51 की धूणी' भी कहा जाता है, यानी 51 गांवों के श्रद्धालु इस पुनीत चमत्कारी धूणी माता से जुड़े हुए हैं। क्षेत्र के इतिहास में वर्षों बाद प्रथम बार मां के नाम की आहुतियां और मंत्रों के उच्चारण के साथ यहाँ यज्ञ-हवन किया जा रहा है। 
निजी वाहनों से ही संभव है सफर
ग्रामीण बताते हैं कि आम दिनों में यहाँ आना बेहद कठिन होता है क्योंकि जंगली जानवरों का डर बना रहता है। इसके बावजूद मां के इस दरबार में दूर-दूर से फरियाद लगाने श्रद्धालु पहुंचते हैं। अब यहाँ सीमेंट-कंक्रीट की पक्की सड़क बन गई है, जिससे स्थल पर पहुंचने में आसानी होती है। हालांकि, यहाँ पहुँचने के लिए निजी वाहन का होना आवश्यक है, क्योंकि मुख्य बस सेवा करीबन 7 किलोमीटर दूर ही मिलती है और वह भी दिनभर में गिनी-चुनी ही चलती हैं।
1000 वर्ष पुराना इतिहास, शेर और तेंदुओं के बीच तपस्या करते हैं 90 वर्षीय पुजारी
मेवाड़ क्षेत्र के इस चमत्कारी धूणी माता मंदिर को लेकर अनेकों धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। स्थानीय बुजुर्गों और पूर्वजों के अनुसार, यह मंदिर 1000 वर्षों से अधिक समय पहले से स्थापित है, हालांकि इसके सटीक स्थापना काल की कोई लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
पुजारी की अनोखी दास्तान: वर्तमान में मंदिर की पूजा-अर्चना 90 वर्षीय तपस्वी पुजारी वजेराम जी, उनके पुत्र और पोते संभाल रहे हैं। परिजनों के अनुसार, वजेराम जी और उनकी अर्धांगिनी ने अपना पूरा जीवन इसी देवी स्थान की सेवा में समर्पित कर दिया। घना जंगल होने के कारण अक्सर शेर और तेंदुए मंदिर परिसर तक आ जाते थे, लेकिन उन्होंने कभी पुजारी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया।
संतों के ठहरने की अनूठी बंदिश और जीर्णोद्धार की बाधा
इस जाग्रत देवस्थान को लेकर एक रहस्यमयी बात यह भी सामने आई है कि यहाँ कोई भी साधु-संत स्थाई आश्रम या कुटिया बनाकर तपस्या नहीं कर सकता। मान्यता है कि हफ्ते भर के भीतर ही संत-महात्माओं को यहाँ से जाना पड़ता है। स्थानीय श्रद्धालुओं ने बताया कि करीब 12 वर्ष पहले एक महात्मा यहाँ आए थे और मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य शुरू करवाया था। लेकिन मंदिर के पास बनी कई वर्ष पुरानी एक अन्य महात्मा की समाधि को नया रूप देने के दौरान निर्माण कार्य में अचानक बाधाएं आने लगीं, जिससे जीर्णोद्धार का काम पिछले 12 वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ था।
महंत श्री शिवानंद गिरी जी ने संभाली कमान
51 गांवों के श्रद्धालुओं के विशेष अनुरोध और निवेदन पर सराई मठ के मठाधीश महंत 1008 श्री शिवानंद गिरी महाराज ने यहाँ कमान संभाली है। वे पिछले एक महीने से यहाँ कुटिया बनाकर रह रहे हैं और मंदिर का जीर्णोद्धार पुनः प्रारंभ करवाया जा रहा है। इसी उपलक्ष्य में 21 से 25 मई तक सर्व समाज समिति द्वारा इस ऐतिहासिक शतचंडी महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है, जिसे स्थानीय लोग मंदिर के इतिहास का पहला यज्ञ बता रहे हैं।
अद्भुत रहस्य: जल के अंदर विराजमान हैं 'केदारनाथ महादेव', स्वयं जल करता है अभिषेक
अरावली की पहाड़ियों और घने जंगल के बीचों-बीच स्थित इस पावन धाम को 'केदारनाथ धूणी माता का स्थान' भी कहा जाता है। इसके पीछे एक गहरी धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक कौतूहल छिपा है।
स्वयं भू अभिषेक: पहाड़ियों पर स्थित एक डैम में बारिश का पानी इकट्ठा होता है। यही पानी भीषण गर्मी में भी निरंतर पहाड़ियों के पत्थरों से रिसता हुआ नीचे आता है और पानी के अंदर विराजमान केदारनाथ महादेव का स्वतः ही निरंतर अभिषेक करता रहता है।
जीवित जल समाधि का रहस्य: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धूणी माता मंदिर के पास स्थित प्राचीन समाधि के महात्मा इसी जल के अंदर बैठकर उपासना करते थे और यह उनकी 'जीवित जल समाधि' है।
दोनों ही देवी-देवताओं के स्थान चमत्कारी होने के साथ-साथ अपना एक गौरवमयी इतिहास समेटे हुए हैं। वर्तमान में यहाँ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए संतों का समागम लगा हुआ है।
कल महाभंडारे के साथ होगा समापन
सोमवार, 25 मई को महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर आयोजन समिति द्वारा हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद जताई जा रही है, जिसके लिए तैयारियां युद्धस्तर पर जारी हैं। कल यज्ञ-हवन के विधिवत समापन के साथ ही एक विशाल महाभंडारे (महाप्रसादी) का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सभी भक्तों को आमंत्रित किया गया है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

लेन-देन या साजिश? युवक की मौत पर नामली थाने के सामने लाश रखकर प्रदर्शन, हत्या के आरोप में पांच नामजद।

नामली थाने में 'वर्दी' हुई दागदार: टीआई अमित कोरी पर फरियादी के साथी को पीटने का आरोप, सीसीटीवी में कैद हुई करतूत।

नामली में जुए पर दोहरी कहानी! गोदाम से छोड़े गए जुआरी,जंगल में दिखाई गई ‘सख्त’ कार्रवाई— पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल।