बंधक यूपी के मजदूरों को बाउंसर्स ने पीटा, मजदूरी मांगी तो नामली पुलिस ने पीड़ितों पर ही ठोंकी धारा 151 ।
₹2 लाख की 'डील' कर थाना प्रभारी अमित कोरी ने फरियादी मजदूरों को ही बनाया आरोपी; सहमे 15 मजदूर पैदल ही यूपी लौटने को मजबूर
नीलू वेयरहाउस में बिना बोर्ड-दस्तावेजों के पिछले फरवरी से फल-फूल रहा था फर्जीवाड़ा, एक्साइज की मिलीभगत से रातों-रात मशीनें गायब
'मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता'— जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ पर जिला खाद्य अधिकारी शैलेश कुमार गुप्ता का गैर-जिम्मेदार बयान
नामली (रतलाम)।
क्षेत्र के नीलू वेयरहाउस में नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रही एक अवैध तंबाकू फैक्ट्री में उत्तर प्रदेश के गरीब मजदूरों के बेरहम शोषण और उसके बाद नामली पुलिस की शर्मनाक कार्यप्रणाली का एक बड़ा भंडाफोड़ हुआ है। अपनी ही मेहनत की गाढ़ी कमाई और मजदूरी की राशि मांगने पर फैक्ट्री मालिक के बाउंसर्स ने यूपी के इन गरीब मजदूरों की बेरहमी से पिटाई कर उन्हें वहां से खदेड़ दिया।
हैरानी की बात तो यह है कि जब लहूलुहान और डरे-सहमे मजदूर न्याय की आस में नामली थाने पहुंचे, तो थाना प्रभारी अमित कोरी ने रसूखदार फैक्ट्री मालिक पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टा पीड़ित मजदूरों के खिलाफ ही धारा 151 (शांति भंग करने की आशंका) के तहत प्रतिबंधात्मक प्रकरण दर्ज कर जेल भेजने की तैयारी कर ली। पुलिस और दबंगों के इस खौफ के कारण करीब 15 मजदूर रतलाम होकर पैदल और ट्रेन के रास्ते किसी तरह अपनी जान बचाकर वापस यूपी भाग रहे हैं।
नामली पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज: इन 6 बेकसूर मजदूरों को बनाया 'गुनेहगार'।
थाने में न्याय मांगने पहुंचे जिन 6 सीधे-साधे और गरीब श्रमिकों को नामली पुलिस ने अपनी सोची-समझी साजिश के तहत धारा 151 का आरोपी बना दिया, उनके नाम और पते इस प्रकार हैं:
सत्यप्रकाश आत्मज सुग्रीव पाण्डे (उम्र 34 वर्ष) – निवासी: गांव डोहतापुर, जिला: सीतापुर (उ.प्र.), हाल मुकाम: नामली।
धीरज आत्मज सुग्रीव पाण्डे (उम्र 28 वर्ष) – निवासी: सदर, जिला: सीतापुर (उ.प्र.)।
लक्ष्मीकान्त आत्मज शिवसागर तिवारी (उम्र 33 वर्ष) – निवासी: सदर, जिला: सीतापुर (उ.प्र.)।
अमित आत्मज रामचन्द्र शुक्ला (उम्र 25 वर्ष) – निवासी: रमुआपुर, पोस्ट: सीतापुर (उ.प्र.)।
पंकज आत्मज रामचन्द्र यादव (उम्र 25 वर्ष) – निवासी: डोहतापुर, जिला: सीतापुर (उ.प्र.)।
लवकुश आत्मज राज किशोर (उम्र 22 वर्ष) – निवासी: रसुलवा, जिला: सीतापुर (उ.प्र.)।
आखिर धारा 151 ही क्यों? पुलिस की 'कैलकुलेटेड' चाल के पीछे का सच।
कानून के जानकारों और सूत्रों की मानें तो पुलिस द्वारा इन मजदूरों पर धारा 151 लगाना एक सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा है, ताकि फैक्ट्री मालिक को आंच न आए:मजदूरों की आवाज दबाना और डराना: जब मजदूर मारपीट की शिकायत लेकर पहुंचे, तो पुलिस ने उन पर ही शांति भंग की धारा लगा दी। इससे मजदूर कानूनी पचड़े में फंसने के डर से अपनी मजदूरी भूल गए और वहां से भागने को मजबूर हो गए।
₹2 लाख का कथित लेनदेन: सूत्रों का दावा है कि नामली थाने में फैक्ट्री मालिक की तरफ से ₹2 लाख का मोटा नजराना पेश किया गया था। इसी 'ऋण' का फर्ज निभाते हुए खाकी ने पीड़ितों को ही उपद्रवी साबित कर दिया।
अवैध फैक्ट्री का सच छुपाना: यदि पुलिस मजदूरों की शिकायत पर बंधक बनाने और जानलेवा हमले की गंभीर धाराओं में केस दर्ज करती, तो पुलिस को मौके पर जाकर जांच करनी पड़ती। इससे इस अवैध फैक्ट्री का भांडा फूट जाता। इस राज को दबाने के लिए ही केवल धारा 151 का पर्चा फाड़ा गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि नीलू वेयरहाउस में पिछले साल फरवरी से यह अवैध तंबाकू फैक्ट्री बिना किसी बोर्ड या वैध लाइसेंस के फर्जी तरीके से चल रही थी। जैसे ही मजदूरों से मारपीट का यह मामला गरमाया, आबकारी विभाग ने मुस्तैदी दिखाने के बजाय कथित रूप से सांठगांठ कर मामले को रफा-दफा करने का मौका दे दिया। इसी का फायदा उठाकर फैक्ट्री संचालकों ने रातों-रात लाखों रुपये की तंबाकू बनाने वाली मशीनें वहां से गायब कर दीं, ताकि मौके पर कोई सबूत ही न बचे।
स्वास्थ्य से खिलवाड़, पर जिम्मेदार 'मौन'
इस फर्जी और अवैध फैक्ट्री में बिना किसी मानक के धड़ल्ले से तंबाकू बनाई जा रही थी, जो सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ जानलेवा खिलवाड़ है। लेकिन जब इस गंभीर लापरवाही को लेकर जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी शैलेश कुमार गुप्ता से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना रुख अपनाते हुए साफ कह दिया कि "यह मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता है।"
अधिकारियों का यह रवैया साफ बयां करता है कि रसूखदारों के चंद रुपयों के आगे प्रशासनिक तंत्र कितना पंगु हो चुका है। अब देखना यह है कि क्या रतलाम के वरिष्ठ अधिकारी और शासन इस 'खाकी-प्रशासन और धनपशुओं' के कॉकटेल पर कोई सख्त एक्शन लेते हैं, या फिर ये गरीब मजदूर यूं ही व्यवस्था के हाथों प्रताड़ित होते रहेंगे।
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